आज की बात

बातें इधर उधर की --कुछ अपनी कुछ आपकी

Tuesday, July 25, 2006

याद ना जाये बीते दिनों की

कुछ ऐसी बातें जो हमें रह रह कर याद आती है ।
जब गुल्ली डंडा और कंचे (अंटी) को क्रिकेट से ज्यादा खेला जाता था ।
जब सारे दोस्त आइस पाइस, छीपन छाई, सितोलिया खेलने के लिये हरदम तैयार रहते थे ।
जब हम “यह जो है जिन्दगी” का हफ्ते के शुरुआत से इंतज़ार करते थे।
जब चित्रहार विक्रम-बैताल के आसपास टीवी सिमट जाता था।
जब पूरे मोहल्ले में एक ही टीवी रहा करता था ।
जब बिस्लरी की बोतलें रेल में नही मिला करती, और हमें इंतज़ार रह्ता था अगले स्टेशन के आने का और पानी कि बोतल भर्ने क ।
जब हम 9:00 बजे बराबर सो जाया करते थे , केवल जिस दिन “यह जो है जिन्दगी” आने वाला होता था ।
जब होली और दिवाली का मतलब मम्मी के हाथ से बनी मिठाई से होता था ।
जब हमारे टिचर को हमें मारने में डरते नही थे (खास करके हमारे माता पिता से)
जब बिल्लू और चाचा चौधरी हमारे हिरो थे, नही कि सुपरमेन
जब गर्मी की छुट्ठी का ननिहाल से सीधा रिश्ता था – और पतंग का संबन्ध दैनिक क्रिया कलाप से था।
जब “नटराज” की पेंसिल “रेनाल्ड” से ज्यादा चलती थी।
जब 50 पैसे का मतलब 30 गोली हुआ करती थी ।
जब पिछ्ले साल की कापी के बचे पन्ने अगले साल के “रफ़” काम के लिये इस्तेमाल होते थे ।
जब पहली बारिश का मतलब कागज़ की कश्ती से होता था ।

अंतरात्मा

रोज की ही तरह मैं आज सुबह उठा और अपने दैनिक कार्यों में लगा हुआ था, की अचानक से हुई आवाज़ ने मेरा ध्यान वहां पर केन्द्रित किया --- वो आवाज़ थी मेरी अंतरात्मा की –जो कि चीख़ चीख़ कर रो रही थी और मुझसे कुछ कहने की कोशिश कर रही