tag:blogger.com,1999:blog-316614852008-03-01T06:19:59.243-08:00आज की बातप्रभंजन नागरhttp://www.blogger.com/profile/06510390489745801997noreply@blogger.comBlogger2125tag:blogger.com,1999:blog-31661485.post-1153878807222701692006-07-25T18:53:00.000-07:002006-07-25T18:53:27.233-07:00याद ना जाये बीते दिनों कीकुछ ऐसी बातें जो हमें रह रह कर याद आती है ।<br />जब गुल्ली डंडा और कंचे (अंटी) को क्रिकेट से ज्यादा खेला जाता था ।<br />जब सारे दोस्त आइस पाइस, छीपन छाई, सितोलिया खेलने के लिये हरदम तैयार रहते थे ।<br /> जब हम “यह जो है जिन्दगी” का हफ्ते के शुरुआत से इंतज़ार करते थे।<br />जब चित्रहार विक्रम-बैताल के आसपास टीवी सिमट जाता था।<br />जब पूरे मोहल्ले में एक ही टीवी रहा करता था ।<br />जब बिस्लरी की बोतलें रेल में नही मिला करती, और हमें इंतज़ार रह्ता था अगले स्टेशन के आने का और पानी कि बोतल भर्ने क ।<br />जब हम 9:00 बजे बराबर सो जाया करते थे , केवल जिस दिन “यह जो है जिन्दगी” आने वाला होता था ।<br />जब होली और दिवाली का मतलब मम्मी के हाथ से बनी मिठाई से होता था ।<br />जब हमारे टिचर को हमें मारने में डरते नही थे (खास करके हमारे माता पिता से)<br />जब बिल्लू और चाचा चौधरी हमारे हिरो थे, नही कि सुपरमेन<br />जब गर्मी की छुट्ठी का ननिहाल से सीधा रिश्ता था – और पतंग का संबन्ध दैनिक क्रिया कलाप से था।<br />जब “नटराज” की पेंसिल “रेनाल्ड” से ज्यादा चलती थी।<br />जब 50 पैसे का मतलब 30 गोली हुआ करती थी ।<br />जब पिछ्ले साल की कापी के बचे पन्ने अगले साल के “रफ़” काम के लिये इस्तेमाल होते थे ।<br />जब पहली बारिश का मतलब कागज़ की कश्ती से होता था ।प्रभंजन नागरhttp://www.blogger.com/profile/06510390489745801997noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-31661485.post-1153868773381201052006-07-25T15:53:00.000-07:002006-07-25T17:35:29.876-07:00अंतरात्मारोज की ही तरह मैं आज सुबह उठा और अपने दैनिक कार्यों में लगा हुआ था, की अचानक से हुई आवाज़ ने मेरा ध्यान वहां पर केन्द्रित किया --- वो आवाज़ थी मेरी अंतरात्मा की –जो कि चीख़ चीख़ कर रो रही थी और मुझसे कुछ कहने की कोशिश कर रहीप्रभंजन नागरhttp://www.blogger.com/profile/06510390489745801997noreply@blogger.com